Sunday, May 24, 2009

कितना सुगम औ 'कठिन!

फूलों की खुशबू से महक उठा वह चमन
यादों की महक से खिल उठा यह मन
उस महक पर है बयार का शासन
इस महक पर है आत्मीयता का बंधन
मन चाहा,यादों का कारवां खिला लो
और तनहाई के पलों में सुगंध भर दो
यहाँ न कोई बाह्य बंधन और शासन
मन तो अपना है कर लो आपही नियंत्रण .

2 comments:

  1. బాగుంది బాగుంది. కష్ట పడి చదివా .. హింది లో చదివి మళ్ళా తెలుగులో తర్జుమా చేసుకొని అర్థం చేసునున్నా. :) 8th లో వదిలేసిన హింది ఇంకా కొంచం యాద్కి ఉంది..

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  2. i love the poem ma. you are such a good writer :)

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