Sunday, September 27, 2009

तनया !{on the occasion of daughter's day}

तीन दशक औ'वर्ष चार
आषाढ़ कृष्ण त्रयोदशी
तेरा आरुद्र में आगमन
पुलकित हुआ एक
माँ की पुत्रि का मन
अपनी बिटिया की
निष्पाप मुस्कान में
खो गया इस माँ का मन .


चाह

प्रभो!
उम्मीद है
आंस है
बढ़कर
विश्वास है
की यह साँस
पयनयुत पवन में
समाने से पूर्व
तू अवश्य
संकेत देगा
की अब वह
लम्हा आ पहुँचा
अलविदा कहने का
दुनिया की गलियों से
चुपचाप गुजर निकलने का ,
अनजाने असीम
डगर से च्युत हो
इस पार्थिव देह
का साथ छोड़
मिटटी की खुशबू
से नाता तोड़
सर्दी गर्मी के एहसास
को विदा कहने का
उस पल का
उस क्षण का
उस लम्हे का
चेतन आभास
अवश्य कराएगा ।












ऐसा क्यों हुआ?

जीवन के आँगन में
बरसों पहले
एक बीज
हुआ अंकुरित ,
धीरे धीरे सघन
आशा पल्लव स्थित
पौधे में परिवर्तित
सीमित टहनियों से
होने चला विस्तृत ।
पर वह हुआ
आश्रित धरा से
योंही शंकित
औ,लेने लगा
जीवन रस सशंकित ।
पूहा मूक अभिभावित
वेदना संतप्त
निरंतर व्यतिथ
पर सिंचन को
सदा उद्युत ।