Sunday, July 5, 2009

काश पता दे जाती !!

धरा पर आगमन से
तुझे पता मिला
नाम की मुहर लगी औ '
जीवन के कर्मजाल को
तुने उस पल गले लगा,
रिश्ते नातों की नाजुक डोरी से
अपनी अस्मिता को बुन लिया।
आत्मीयता के बंटवारे में,
जब जिसने जो माँगा
ना कभी ,
तुझसे कहा गया औ '
अपनत्व के एहसास को
चिरंतन स्पंदित ही रखा ।
लेन देन की इस दुनिया में
देने का आनंद तूने
बखूब समझा ,
शाएद इसलिए
तेरे जीते जी
मुझे कभी
खाली हाथ
लौटना न पड़ा।
पर ,आज मैं तुझे
कुछ देना चाहूँ ,तो
तूने अपना पता ही
नहीं छोडा !
काश तू पता दे जाती
उर्रून होने का अवसर
इस आयु में
मुझे मिल जाता!
सब रिश्ते नाते तोड़
नाम पीछे छोड़
दूर दिगंतर की
अनजान डगर पर
अकेले तू चल पड़ी।
काश पता दे जाती
तो शाएद
कभी कबार भेंट की
धुंधली आंस औ '
तेरी आत्मीयता की
नमीं से सिंचित
मेरे ममत्व का
आभास
तुझे करा देती।