-- अंतर मन की आवाज--
हे प्रभो!
वर्षों पहले तेरी
सुगंधी लिए
एक चहकती चिड़िया
उतर आई
इस भूतल पर .
चिड़िया ही थी
जो चोंच खोलें
आशा से दाना पाने
निरंतर निहारती रहती
दिन बीत कर
बरसों में
बदल गए
आज भी
आकुल मन से
आंस भरे पलों को
थाम सीने से
तेरे स्पर्श सिंचित
उस दाने की
ताक में
चोंच उघाड़े
निहार रही है !
ढलती उम्र की
देहलीज पर खड़े
मेरे इस मन की
आवाज को
तनिक ध्यान से
सुनो दाता
तू दानी है
फिर देने में
यह देरी क्यों?
बस एक बार
इस भूतल पर
तेरी महक
फैलाने की
उमंग भरी
उस चिड़िया की
चोंच को
अपनी दया से
भर दे !
Wednesday, August 4, 2010
Saturday, July 31, 2010
yachana
दुनिया से मतलब रखता जो
था उसका धरोहर तेरा अंश
उस पावन अंश से बिछुड़
पड़ा है यह पार्थिव देह
दुनियादारी के कदम उठाते
उस अंश सहित देह ने
भरा चिटठा कर्मोंका
जो आज तेरे सामने
खुलने को है तैयार
हे प्रभो!
सांस चलते
देह रखते
जो संभल न पाया
अब हाथ मसलता
रह गया
तू दया का दाता
आज बन न्यायनिहन्ता
मेरे बुरे करतूतों को
नजरंदाज न करना
पर ऐसी सजा सुनाना
जिसे भुगतते
तेरा कभी साथ न छुटे
तेरी साया में
मेरा हर लम्हा
समा जाये
था उसका धरोहर तेरा अंश
उस पावन अंश से बिछुड़
पड़ा है यह पार्थिव देह
दुनियादारी के कदम उठाते
उस अंश सहित देह ने
भरा चिटठा कर्मोंका
जो आज तेरे सामने
खुलने को है तैयार
हे प्रभो!
सांस चलते
देह रखते
जो संभल न पाया
अब हाथ मसलता
रह गया
तू दया का दाता
आज बन न्यायनिहन्ता
मेरे बुरे करतूतों को
नजरंदाज न करना
पर ऐसी सजा सुनाना
जिसे भुगतते
तेरा कभी साथ न छुटे
तेरी साया में
मेरा हर लम्हा
समा जाये
Wednesday, July 28, 2010
दुनिया से रखता जो
था उसका धरोहर तेरा अंश
उस पावन अंश से बिछुड़
पड़ा है यह पार्थिव देह
दुनियादारी के कदम उठाते
उस अंशसहित देह ने
भरा चिठ्ठा कर्मोंका
जो आज तेरे सामने
खुलनेको है तैयार ,
हे प्रभो ,सांस चलते
देहा रखते
जो संभल न पाया
अब हाथ मसलता
रह गया !
तू दया का दाता
आज बन न्यायनिहन्ता
मेरे बुरे करतूतों को
था उसका धरोहर तेरा अंश
उस पावन अंश से बिछुड़
पड़ा है यह पार्थिव देह
दुनियादारी के कदम उठाते
उस अंशसहित देह ने
भरा चिठ्ठा कर्मोंका
जो आज तेरे सामने
खुलनेको है तैयार ,
हे प्रभो ,सांस चलते
देहा रखते
जो संभल न पाया
अब हाथ मसलता
रह गया !
तू दया का दाता
आज बन न्यायनिहन्ता
मेरे बुरे करतूतों को
Wednesday, February 17, 2010
आश्वासन !
हे प्रभु !जीवन की क्षणिकता की पतीति मुझे करा दो
ताकि मेरे भीतर का विवेक पनप उठे .{90:12}
एक वही मेरा धाम औ सुरक्षा स्थान है
वह है मेरा भगवन और आस्थागार
उसके प्रति विश्वास ने
रात की अंधियारी में भयावह रोग की भीति
तथा दिन की उजयारी में विपत्तियों की चपेट से
मुझे भय मुक्त किया .
यदि प्रभु ही हमारा धाम बन जाए औ
अत्युन्नत परमपिता हमारा छाता
तो विपत्तियाँ पराजित होगी .
उस की करुणा से
कोई रोग निकट आनेका साहस नहीं करेगा
क्योंकि अपने हाथों से गिरते हुए हमें
अनायास झेलकर किंचित भी
जखमी होने से
वह बचाएगा ।
क्योंकि स्वयं भगवान् ने कहा कि
"जो मुझसे प्रेम करता है उसे बचाऊंगा ,
जो मुझमें विश्वास रखता है उसकी रक्षा करूंगा .
ताकि मेरे भीतर का विवेक पनप उठे .{90:12}
एक वही मेरा धाम औ सुरक्षा स्थान है
वह है मेरा भगवन और आस्थागार
उसके प्रति विश्वास ने
रात की अंधियारी में भयावह रोग की भीति
तथा दिन की उजयारी में विपत्तियों की चपेट से
मुझे भय मुक्त किया .
यदि प्रभु ही हमारा धाम बन जाए औ
अत्युन्नत परमपिता हमारा छाता
तो विपत्तियाँ पराजित होगी .
उस की करुणा से
कोई रोग निकट आनेका साहस नहीं करेगा
क्योंकि अपने हाथों से गिरते हुए हमें
अनायास झेलकर किंचित भी
जखमी होने से
वह बचाएगा ।
क्योंकि स्वयं भगवान् ने कहा कि
"जो मुझसे प्रेम करता है उसे बचाऊंगा ,
जो मुझमें विश्वास रखता है उसकी रक्षा करूंगा .
Sunday, September 27, 2009
तनया !{on the occasion of daughter's day}
तीन दशक औ'वर्ष चार
आषाढ़ कृष्ण त्रयोदशी
तेरा आरुद्र में आगमन
पुलकित हुआ एक
माँ की पुत्रि का मन
अपनी बिटिया की
निष्पाप मुस्कान में
खो गया इस माँ का मन .
आषाढ़ कृष्ण त्रयोदशी
तेरा आरुद्र में आगमन
पुलकित हुआ एक
माँ की पुत्रि का मन
अपनी बिटिया की
निष्पाप मुस्कान में
खो गया इस माँ का मन .
चाह
प्रभो!
उम्मीद है
आंस है
बढ़कर
विश्वास है
की यह साँस
पयनयुत पवन में
समाने से पूर्व
तू अवश्य
संकेत देगा
की अब वह
लम्हा आ पहुँचा
अलविदा कहने का
दुनिया की गलियों से
चुपचाप गुजर निकलने का ,
अनजाने असीम
डगर से च्युत हो
इस पार्थिव देह
का साथ छोड़
मिटटी की खुशबू
से नाता तोड़
सर्दी गर्मी के एहसास
को विदा कहने का
उस पल का
उस क्षण का
उस लम्हे का
चेतन आभास
अवश्य कराएगा ।
उम्मीद है
आंस है
बढ़कर
विश्वास है
की यह साँस
पयनयुत पवन में
समाने से पूर्व
तू अवश्य
संकेत देगा
की अब वह
लम्हा आ पहुँचा
अलविदा कहने का
दुनिया की गलियों से
चुपचाप गुजर निकलने का ,
अनजाने असीम
डगर से च्युत हो
इस पार्थिव देह
का साथ छोड़
मिटटी की खुशबू
से नाता तोड़
सर्दी गर्मी के एहसास
को विदा कहने का
उस पल का
उस क्षण का
उस लम्हे का
चेतन आभास
अवश्य कराएगा ।
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