Wednesday, August 4, 2010

     -- अंतर मन की आवाज--                                            
हे प्रभो!
वर्षों पहले तेरी
सुगंधी लिए
एक चहकती चिड़िया
उतर आई
इस भूतल पर .
चिड़िया ही थी
जो  चोंच खोलें
आशा से दाना पाने
निरंतर निहारती रहती
दिन बीत कर
बरसों में
बदल गए
आज भी
आकुल मन से
आंस भरे पलों को
थाम सीने  से
तेरे स्पर्श सिंचित
उस दाने की
ताक में
चोंच उघाड़े
निहार रही है !
 ढलती उम्र की
देहलीज पर खड़े
मेरे इस मन की
आवाज को
तनिक ध्यान से
सुनो दाता
तू दानी है
फिर देने में
यह देरी क्यों?
बस एक बार
इस भूतल पर
तेरी महक
फैलाने की
उमंग भरी
उस चिड़िया की
चोंच को
अपनी दया से
भर दे !

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