चल पड़े जीवन की डगर पर
गिनते मील पत्थरों की कतार
कुछ बिना गिने ही जुड़ गए
आरम्भ के पत्थर
बिना समझे बूझे
कर गए पार!
जब होश संभाला
तो पाया अंको ने किया
विंशति को पार .
आत्मा का पयन अनंत
वसंत शिशिर का यह अट्टहास ?
जीवन की सड़क पर
चलें मील पत्थर करते पार।
अंकों को जोड़ते जोड़ते
पहुंचे जब एक मुकाम
इस अस्थिपंजर साथी ने
मुंह फेर लिया
चलती राह में ,
पर मार्ग तय करना है.
मंजिल का पता नहीं
सड़क हैं सुनसान
मील पत्थर का
नहीं नामोनिशान ! !
उस दूर क्षितिज पर
आशा की एक
किरण
एक सुखद
आभास
आंस जग उठी
हौसला बढ़ा
उमंग पुलक उठी
सड़क नापने पग बढे
कुछ डगमगाते
कुछ संभले संभले
नये सीरेसे निकल पड़े
मील पत्थर नापने ।
पर..यह क्या ?
साँस फूलने लगी
नजर धुंधला गई
पग कांपने लगे
चिन्हित अंक धूमिल हुए
फिर भी चलना है
चलते रहना है
पगों की
कवायत को
जारी रखना है
क्योंकि,
मंजिल तक पहुँचना है
किंतु ?क्या वहां पहुँच
मंजिल कि पहचान होगी?
पता नहीं !
क्योंकि ,
पहचान का कोई चिन्ह
विरासत में हमें
मिला नहीं !!!
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